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पूर्व स्मृति!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह…
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आग लगा के रह गईं!
कौन सुकून दे सका ग़म-ज़दगान-ए-इश्क़ को, भीगती रातें भी ‘फ़िराक़’ आग लगा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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रंग जमा के रह गईं!
फिर हैं वही उदासियाँ फिर वही सूनी काएनात, अहल-ए-तरब* की महफ़िलें रंग जमा के रह गईं| *मज़ा करने वालों फ़िराक़ गोरखपुरी
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सीनों पे छा के रह गईं!
झूम के फिर चलीं हवाएँ वज्द में आईं फिर फ़ज़ाएँ, फिर तिरी याद की घटाएँ सीनों पे छा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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इमर्जेंसी!
आज शायद पहली बार मैं प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार और उपन्यासकार, ‘मैला आँचल’ के यशस्वी रचयिता स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रेणु जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और उनकी रचना ‘मारे गए गुलफाम’ पर ही शैलेंद्र जी ने फिल्म ‘तीसरी कसम’ बनाई थी जिसमें स्वर्गीय राज कपूर…