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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Sep 2023

    आँखें बिछा के रह गईं!

    तुम नहीं आए और रात रह गई राह देखती, तारों की महफ़िलें भी आज आँखें बिछा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    दर्द सुना के रह गईं!

    साज़-ए-नशात-ए-ज़िंदगी* आज लरज़ लरज़ उठा, किसकी निगाहें इश्क़ का दर्द सुना के रह गईं| *ज़िंदगी का आनंद दिलाने वाला साज़ फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    दर्द उठा के रह गईं!

    याद कुछ आईं इस तरह भूली हुई कहानियाँ, खोए हुए दिलों में आज दर्द उठा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    उनको रुला के रह गईं

    और तो अहल-ए-दर्द कौन सँभालता भला, हाँ तेरी शादमानियाँ* उनको रुला के रह गईं| *खुश होना फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    शाने हिला के रह गईं!

    उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें, ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता* के शाने हिला के रह गईं| *दुर्भाग्य फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    नाम बता के रह गईं!

    तारों की आँख भी भर आई मेरी सदा-ए-दर्द पर, उनकी निगाहें भी तिरा नाम बता के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    उषस् (चार)!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय नरेश मेहता  जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुबह होने की घटना ऐसी है जो निरंतर होती रहती है लेकिन अत्यंत दिव्य है| नरेश मेहता जी ने इस दिव्य घटना से प्रेरित होकर ‘उषस्’ शीर्षक सेचार रचनाएं लिखी हैं, जिनमें से यह…

  • 10th Sep 2023

    फ़ित्ने जगा के रह गईं!

    पूछ न उन निगाहों की तुर्फ़ा करिश्मा-साज़ियाँ, फ़ित्ने* सुला के रह गईं फ़ित्ने* जगा के रह गईं| *उथल-पुथल फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 10th Sep 2023

    ख़ाक उड़ा के रह गईं!

    तेरे ख़िराम-ए-नाज़* से आज वहाँ चमन खिले, फ़सलें बहार की जहाँ ख़ाक उड़ा के रह गईं| *मतवाली चाल फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 10th Sep 2023

    दिल में समा के रह गईं

    हुस्न-ए-नज़र-फ़रेब में किस को कलाम था मगर, तेरी अदाएँ आज तो दिल में समा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

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