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गुनाहगार चले गए!
न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफ़ा ये रसन ये दार करोगे क्या, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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बज़्म-ए-यार चले गए!
ये हमीं थे जिनके लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गई, यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सभी इख़्तियार चले गए
न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म न हिकायतें न शिकायतें, तिरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख़्तियार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ग़म-गुसार चले गए!
तिरी कज-अदाई* से हार के शब-ए-इंतिज़ार चली गई, मिरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठ कर मिरे ग़म-गुसार चले गए| *बेवफाई फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जाँ-निसार चले गए!
तिरे ग़म को जाँ की तलाश थी तिरे जाँ-निसार चले गए, तिरी रह में करते थे सर तलब सर-ए-रहगुज़ार चले गए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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मौज!
आज शायद पहली बार मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ हिन्दी के वरिष्ठ कवि स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री जी की एक कविता| शास्त्री जी को अनेक साहित्यिक सम्मान प्राप्त हुए थे तथा पद्मश्री सम्मान भी सरकार की तरफ से प्रदान किया जा रहा था, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था| उन्होंने संस्कृत में भी अनेक रचनाएं लिखी…
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धड़कने की सदा याद!
मुद्दत हुई इक हादसा-ए-इश्क़ को लेकिन, अब तक है तिरे दिल के धड़कने की सदा याद| जिगर मुरादाबादी
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अब तक है वो नग़्मा!
छेड़ा था जिसे पहले-पहल तेरी नज़र ने, अब तक है वो इक नग़्मा-ए-बे-साज़-ओ-सदा याद| जिगर मुरादाबादी