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बेवफ़ा के सामने!
मैं तो उसको देखते ही जैसे पत्थर हो गया, बात तक मुँह से न निकली बेवफ़ा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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मेरी सदा के सामने!
रात इक उजड़े मकाँ पर जा के जब आवाज़ दी, गूँज उट्ठे बाम-ओ-दर मेरी सदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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उस हवा के सामने!
तेज़ थी इतनी कि सारा शहर सूना कर गई, देर तक बैठा रहा मैं उस हवा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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इस अदा के सामने!
बैठ जाता है वो जब महफ़िल में आ के सामने, मैं ही बस होता हूँ उसकी इस अदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
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आबादी में अकेला है!
कितने यार हैं फिर भी ‘मुनीर’ इस आबादी में अकेला है, अपने ही ग़म के नश्शे से अपना जी बहलाता है| मुनीर नियाज़ी
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मुझसे ही शरमाता है!
मुझ से मोहब्बत भी है उसको लेकिन ये दस्तूर है उसका, ग़ैर से मिलता है हँस हँस कर मुझसे ही शरमाता है| मुनीर नियाज़ी
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उसका हाल मुझ सा है
उसको भी तो जाकर देखो उसका हाल भी मुझ सा है, चुप चुप रह कर दुख सहने से तो इंसाँ मर जाता है| मुनीर नियाज़ी
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पीछे पीछे आता है!
अपने घर को वापस जाओ रो रो कर समझाता है, जहाँ भी जाऊँ मेरा साया पीछे पीछे आता है| मुनीर नियाज़ी
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मसूरी यात्रा!
आज एक बार फिर से, किसी जमाने में कवि सम्मेलनों में हास्य कविता का ट्रेड मार्क रहे स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काका जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय काका हाथरसी जी की यह कविता – देवी जी कहने लगीं,…
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किधर गए वो गुनहगार
‘क़तील’ जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया, किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें| क़तील शिफ़ाई