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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Apr 2023

    बेवफ़ा के सामने!

    मैं तो उसको देखते ही जैसे पत्थर हो गया, बात तक मुँह से न निकली बेवफ़ा के सामने| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    मेरी सदा के सामने!

    रात इक उजड़े मकाँ पर जा के जब आवाज़ दी, गूँज उट्ठे बाम-ओ-दर मेरी सदा के सामने| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    उस हवा के सामने!

    तेज़ थी इतनी कि सारा शहर सूना कर गई, देर तक बैठा रहा मैं उस हवा के सामने| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    इस अदा के सामने!

    बैठ जाता है वो जब महफ़िल में आ के सामने, मैं ही बस होता हूँ उसकी इस अदा के सामने| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    आबादी में अकेला है!

    कितने यार हैं फिर भी ‘मुनीर’ इस आबादी में अकेला है, अपने ही ग़म के नश्शे से अपना जी बहलाता है| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    मुझसे ही शरमाता है!

    मुझ से मोहब्बत भी है उसको लेकिन ये दस्तूर है उसका, ग़ैर से मिलता है हँस हँस कर मुझसे ही शरमाता है| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    उसका हाल मुझ सा है

    उसको भी तो जाकर देखो उसका हाल भी मुझ सा है, चुप चुप रह कर दुख सहने से तो इंसाँ मर जाता है| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    पीछे पीछे आता है!

    अपने घर को वापस जाओ रो रो कर समझाता है, जहाँ भी जाऊँ मेरा साया पीछे पीछे आता है| मुनीर नियाज़ी

  • 12th Apr 2023

    मसूरी यात्रा!

    आज एक बार फिर से, किसी जमाने में कवि सम्मेलनों में हास्य कविता का ट्रेड मार्क रहे स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| काका जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|  लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय काका हाथरसी जी की यह कविता –  देवी जी कहने लगीं,…

  • 11th Apr 2023

    किधर गए वो गुनहगार

    ‘क़तील’ जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया, किधर गए वो गुनहगार आओ सच बोलें|     क़तील शिफ़ाई

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