-
हमसे दश्त की आबादी
हमसे नाम जुनूँ का क़ाइम हमसे दश्त की आबादी, हमसे दर्द का शिकवा करते हमको ज़ख़्म दिखाते हो| इब्न-ए-इंशा
-
भोले भी बन जाते हो!
बेकल बेकल रहते हो पर महफ़िल के आदाब के साथ, आँख चुराकर देख भी लेते भोले भी बन जाते हो| इब्न-ए-इंशा
-
वहशत में उलझाते हो!
सुनते हैं फिर छुप छुप उनके घर में आते जाते हो, ‘इंशा’ साहब नाहक़ जी को वहशत में उलझाते हो| इब्न-ए-इंशा
-
इतने चेहरे इतने लोग!
इस बस्ती में इतने घर थे इतने चेहरे इतने लोग, और किसी के दर पे न पहुँचा ऐसा होश दिवाने में| इब्न-ए-इंशा
-
इस सारे अफ़्साने में!
किसका किसका हाल सुनाया तूने ऐ अफ़्साना-गो, हमने एक तुझी को ढूँडा इस सारे अफ़्साने में| इब्न-ए-इंशा
-
ये तहरीर मिटाने में!
जनम जनम के सातों दुख हैं उसके माथे पर तहरीर, अपना आप मिटाना होगा ये तहरीर मिटाने में| इब्न-ए-इंशा
-
दिल के दौलत-ख़ाने में
जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में, लैला तो ऐ क़ैस मिलेगी दिल के दौलत-ख़ाने में| इब्न-ए-इंशा
-
विप्लव गान!
आज मैं हमारे देश के एक प्रमुख राष्ट्रवादी कवि रहे स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता का कुछ अंश हमारी स्कूल की पाठ्य पुस्तक में भी शामिल था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की यह कविता – कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,जिससे उथल-पुथल…
-
याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’!
याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’ उस शाम की तन्हाइयाँ, एक मैदाँ इक दरख़्त और तू ख़ुदा के सामने| मुनीर नियाज़ी