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चिड़ियाँ हैं न पुरवाई है!
अब नज़र आता नहीं कुछ भी दुकानों के सिवा, अब न बादल हैं न चिड़ियाँ हैं न पुरवाई है| निदा फ़ाज़ली
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भूक है महँगाई है!
तीन चौथाई से ज़ाइद हैं जो आबादी में, उनके ही वास्ते हर भूक है महँगाई है| निदा फ़ाज़ली
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इंसान की तन्हाई है!
इतनी ख़ूँ-ख़ार न थीं पहले इबादत-गाहें, ये अक़ीदे हैं कि इंसान की तन्हाई है| निदा फ़ाज़ली
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कोई हिन्दू, मुस्लिम
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है, सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है| निदा फ़ाज़ली
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वो काँच का पैकर है
यूँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं ‘मोहसिन’, वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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पलटकर तिरी आँखें!
मैं संग-सिफ़त एक ही रस्ते में खड़ा हूँ, शायद मुझे देखेंगी पलट कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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चादर तिरी आँखें!
मुमकिन हो तो इक ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ, फिर ओढ़ न लें ख़्वाब की चादर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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मंज़र तिरी आँखें!
अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता, भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी