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फूल चुन लिए वर्ना
ग़ज़ल ने बहते हुए फूल चुन लिए वर्ना, ग़मों में डूब कर हम लोग मर गए होते| बशीर बद्र
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सिंगार-दान में रहते हो
सिंगार-दान में रहते हो आइने की तरह, किसी के हाथ से गिर कर बिखर गए होते| बशीर बद्र
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दुनिया बदल सकती है
बदलना चाहो तो दुनिया बदल भी सकती है, अजब फ़ुतूर सा हर वक़्त सर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
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मेरे घर में रहता है!
जो मिलना चाहो तो मुझ से मिलो कहीं बाहर, वो कोई और है जो मेरे घर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
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बन गई कविता मेरी!
एक बार फिर से मैं आज अपने समय के अत्यंत प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंग जी की काव्य प्रस्तुति की अपनी ही अलग शैली थी, उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का…
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सूरज सहर में रहता है
अजीब दौर है ये तय-शुदा नहीं कुछ भी, न चाँद शब में न सूरज सहर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
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कभी बशर में कभी
ख़ुदा तो मालिक-ओ-मुख़्तार है कहीं भी रहे, कभी बशर में कभी जानवर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
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मगर वो ख़ौफ़ जो!
लड़ाई देखे हुए दुश्मनों से मुमकिन है, मगर वो ख़ौफ़ जो दीवार-ओ-दर में रहता है| निदा फ़ाज़ली
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सफ़र में रहता है!
न जाने कौन सा मंज़र नज़र में रहता है, तमाम उम्र मुसाफ़िर सफ़र में रहता है| निदा फ़ाज़ली