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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th May 2023

    तुझे डर न मिलेगा!

    मैं ये नहीं कहता कि मिरा सर न मिलेगा, लेकिन मिरी आँखों में तुझे डर न मिलेगा| वसीम बरेलवी

  • 20th May 2023

    तुम भी संगसार न हो!

    गुनाहगारों पे उँगली उठाए देते हो, ‘वसीम’ आज कहीं तुम भी संगसार न हो| वसीम बरेलवी

  • 20th May 2023

    अश्क-बार न हो!

    दुखी समाज में आँसू भरे ज़माने में, उसे ये कौन बताए कि अश्क-बार न हो| वसीम बरेलवी

  • 20th May 2023

    ग़म-गुसार न हो!

    ज़रा सी बात पे घुट घुट के सुब्ह कर देना, मिरी तरह भी कोई मेरा ग़म-गुसार न हो| वसीम बरेलवी

  • 20th May 2023

    मेरा इंतिज़ार न हो!

    मैं गाँव लौट रहा हूँ बहुत दिनों के बाद, ख़ुदा करे कि उसे मेरा इंतिज़ार न हो| वसीम बरेलवी

  • 20th May 2023

    मौजों पे इख़्तियार न हो

    हवा ख़िलाफ़ हो मौजों पे इख़्तियार न हो, ये कैसी ज़िद है कि दरिया किसी से पार न हो| वसीम बरेलवी

  • 20th May 2023

    अन्वेषण!

    आज मैं हिन्दी कविता की पुरानी पीढ़ी के महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय रामनरेश त्रिपाठी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| त्रिपाठी जी की कुछ कविताएं आज भी बहुत लोकप्रिय हैं, जैसे यह प्रार्थना- ‘हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए’| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वर्गीय रामनरेश त्रिपाठी जी जी की यह कविता  – मैं…

  • 19th May 2023

    ए’तिबार न हो!

    कुछ इतना ख़ौफ़ का मारा हुआ भी प्यार न हो, वो ए’तिबार दिलाए और ए’तिबार न हो| वसीम बरेलवी

  • 19th May 2023

    काएँ काएँ करने लगे!

    अजीब रंग था मज्लिस का ख़ूब महफ़िल थी, सफ़ेद पोश उठे काएँ काएँ करने लगे|     राहत इंदौरी

  • 19th May 2023

    इल्तिजाएँ करने लगे!

    झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले, वो धूप है कि शजर इल्तिजाएँ करने लगे| राहत इंदौरी

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