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जगह-जगह दरवाज़े!
आज मैं अपने मित्र और अग्रज स्वर्गीय नवीन सागर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| नवीन जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नवीन सागर जी की यह कविता – दीवारें सिर्फ छप्पर साधने के लिए थींजगह-जगह दरवाज़े हमारेखुले हुए थेखिड़कियाँ थींबारजे थे आँगने थे…
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ज़ब्त पर है किस क़दर
मौत भी आई तो चेहरे पर तबस्सुम ही रहा, ज़ब्त पर है किस क़दर हम को भी क़ुदरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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देखिए दुनिया के मंज़र!
सिर्फ़ इतने के लिए आँखें हमें बख़्शी गईं, देखिए दुनिया के मंज़र और ब-इबरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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मेरी सूरत देखिए!
मुस्कुरा कर इस तरह आया न कीजे सामने, किस क़दर कमज़ोर हूँ मैं मेरी सूरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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मेरी ज़रूरत देखिए!
आप इक जल्वा सरासर मैं सरापा इक नज़र, अपनी हाजत देखिए मेरी ज़रूरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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उनकी सूरत देखिए!
मेरी हालत देखिए और उनकी सूरत देखिए, फिर निगाह-ए-ग़ौर से क़ानून-ए-क़ुदरत देखिए| जोश मलीहाबादी
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न दैन्यं न पलायनम्!
आज मैं भारत के पूर्व प्रधान मंत्री, श्रेष्ठ राजनेता और कवि, भारत रत्न- स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| वाजपेयी जी राजनीति में रहते हुए भी हमेशा कविता से जुड़े रहे और उन्होंने बहुत सी यादगार कविताएं लिखो हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की…