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ये न सोचा हमने!
उम्र भर सच ही कहा सच के सिवा कुछ न कहा, अज्र क्या इसका मिलेगा ये न सोचा हमने| शहरयार
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ख़्वाब न देखा हमने!
कौन सा क़हर ये आँखों पे हुआ है नाज़िल, एक मुद्दत से कोई ख़्वाब न देखा हमने| शहरयार
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क्या ख़ूब निभाया हमने!
ख़ुद पशीमान हुए न उसे शर्मिंदा किया, इश्क़ की वज़्अ को क्या ख़ूब निभाया हमने| शहरयार
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देख ली दुनिया हमने!
जुस्तुजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने, इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने| शहरयार
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अंधेरे का मुसाफिर!
आज एक बार फिर से मैं अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| भवानी दादा की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने मृत्यु का उल्लेख अपने अलग अंदाज़ में किया है…