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गुजर गया एक और दिन!
आज एक बार फिर मैं विख्यात कवि और नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीयजी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – गुजर गया एक और दिन,रोज की तरह । चुगली औ’ कोरी तारीफ़,बस…
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जला हुआ न बुझा हुआ
मिरे साथ जुगनू है हम-सफ़र मगर इस शरर की बिसात क्या, ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ| बशीर बद्र
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और वही लॉन भी!
वही शहर है वही रास्ते वही घर है और वही लॉन भी, मगर इस दरीचे से पूछना वो दरख़्त अनार का क्या हुआ| बशीर बद्र
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मेहँदियों से रचा हुआ!
मुझे हादसों ने सजा सजा के बहुत हसीन बना दिया, मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेहँदियों से रचा हुआ| बशीर बद्र
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महकते होंटों के चाँद
वही ख़त कि जिस पे जगह जगह दो महकते होंटों के चाँद थे, किसी भूले-बिसरे से ताक़ पर तह-ए-गर्द होगा दबा हुआ| बशीर बद्र
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नदी के पास खड़ा हुआ
कई मील रेत को काट कर कोई मौज फूल खिला गई, कोई पेड़ प्यास से मर रहा है नदी के पास खड़ा हुआ| बशीर बद्र