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वो पयाम किसका था!
हमारे ख़त के तो पुर्ज़े किए पढ़ा भी नहीं, सुना जो तू ने ब-दिल वो पयाम किसका था| दाग़ देहलवी
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रह गई मुश्ताक़!
तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़, कहो वो तज़्किरा-ए-ना-तमाम किस का था| दाग़ देहलवी
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एहतिमाम किसका था!
न पूछ-गछ थी किसी की वहाँ न आव-भगत, तुम्हारी बज़्म में कल एहतिमाम किसका था| दाग़ देहलवी
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ये कलाम किसका था!
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किसका था| दाग़ देहलवी
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ये काम किसका था!
वो क़त्ल करके मुझे हर किसी से पूछते हैं, ये काम किसने किया है ये काम किसका था| दाग़ देहलवी
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वो नाम किसका था!
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था, न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किसका था| दाग़ देहलवी
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तुम जलाकर दिये !
आज एक बार फिर से मैं अपने समय में काव्य मंचों के एक लोकप्रिय कवि रहे स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| नेपाली जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह कविता – तुम जलाकर दिये,…
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परवाने हज़ारों हैं!
इस शम-ए-फ़रोज़ाँ को आँधी से डराते हो, इस शम-ए-फ़रोज़ाँ के परवाने हज़ारों हैं| शहरयार