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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Jan 2024

    रजनीगन्धा खिले पराए आँगन में!

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| किशन सरोज जी ने अपने गीतों में प्रेम के सुकोमल भावों को बड़ी महारत के साथ अभिव्यक्त किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज का यह गीत– मन की सीमा के…

  • 17th Jan 2024

    बदनाम है चाँद!

    वो जो तेरा दाग़ ग़ुलामी माथे पर लिए फिरता है, उसका नाम तो ‘इंशा’ ठहरा नाहक़ को बदनाम है चाँद|                  इब्न-ए-इंशा

  • 17th Jan 2024

    कहाँ कलाम है चाँद!

    सखियों से कब सखियाँ अपने जी के भेद छुपाती हैं, हम से नहीं तो उस से कह दे करता कहाँ कलाम है चाँद|                  इब्न-ए-इंशा

  • 17th Jan 2024

    तू भी हरे दरीचे वाली!

    तू भी हरे दरीचे वाली आ जा बर-सर-ए-बाम है चाँद, हर कोई जग में ख़ुद सा ढूँडे तुझ बिन बसे आराम है चाँद|                   इब्न-ए-इंशा

  • 17th Jan 2024

    वहशत का पैग़ाम है!

    ऐ दिल वालो घर से निकलो देता दावत-ए-आम है चाँद, शहरों शहरों क़रियों क़रियों वहशत का पैग़ाम है चाँद|                  इब्न-ए-इंशा

  • 17th Jan 2024

    चिट्ठी खोल दी हमने!

    तुम्हारे दुख उठाए इसलिए फिरते हैं मुद्दत से, तुम्हारे नाम आई थी जो चिट्ठी खोल दी हमने|                मुनव्वर राना

  • 17th Jan 2024

    प्रगल्भ प्रेम!

    आज मैं छायावाद काल के एक प्रमुख स्तंभ, और हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| निराला जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की यह कविता – आज नहीं है मुझे और कुछ…

  • 16th Jan 2024

    पट्टी खोल दी हमने!

    पुराने हो चले थे ज़ख़्म सारे आरज़ूओं के, कहो चारागरों से आज पट्टी खोल दी हमने|               मुनव्वर राना

  • 16th Jan 2024

    खिड़की खोल दी हमने

    तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता, तुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हमने|                मुनव्वर राना

  • 16th Jan 2024

    गठरी खोल दी हमने!

    फ़रिश्तो तुम कहाँ तक नामा-ए-आमाल देखोगे, चलो ये नेकियाँ गिन लो कि गठरी खोल दी हमने|                  मुनव्वर राना

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