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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Jan 2024

    इसी उमीद पे कब से!

    इसी उमीद पे कब से धड़क रहा है दिल, तिरे हुज़ूर किसी रोज़ ये तलब होगा|             शहरयार

  • 21st Jan 2024

    बच्चा!

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में उल्लेखनीय योगदान करने वाले श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| बच्चे पर यह कविता तीन भाग में लिखी गई है|   मिश्र जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री…

  • 20th Jan 2024

    दोस्त यूँ तो सब होगा!

    जहाँ में होने को ऐ दोस्त यूँ तो सब होगा, तिरे लबों पे मिरे लब हों ऐसा कब होगा|             शहरयार

  • 20th Jan 2024

    सफ़र की किताब जैसी

    ‘मुनीर’ तेरी ग़ज़ल अजब है, किसी सफ़र की किताब जैसी|           मुनीर नियाज़ी

  • 20th Jan 2024

    ये शहर लगता है!

    ये शहर लगता है दश्त जैसा, चमक है उस की सराब जैसी|          मुनीर नियाज़ी

  • 20th Jan 2024

    रात गहरे अज़ाब जैसी!

    वो दिन था दोज़ख़ की आग जैसा, वो रात गहरे *अज़ाब जैसी| *यातना         मुनीर नियाज़ी 

  • 20th Jan 2024

    गा रही कविता युगों से मुग्ध हो!

    आज एक बार फिर से मैं राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दिनकर जी ने ओज और शृंगार दोनों प्रकार की कविताओं के प्रतिमान रचे हैं|   दिनकर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी…

  • 19th Jan 2024

    मौसम के ख़्वाब जैसी!

    हवा सहर की है इन दिनों में, बदलते मौसम के ख़्वाब जैसी|          मुनीर नियाज़ी

  • 19th Jan 2024

    शक्ल तेरी गुलाब जैसी!

    है शक्ल तेरी गुलाब जैसी, नज़र है तेरी शराब जैसी|         मुनीर नियाज़ी

  • 19th Jan 2024

    जिनको होना है अभी!

    बैठ जाएँ साया-ए-दामान-ए-अहमद में ‘मुनीर’. और फिर सोचें वो बातें जिनको होना है अभी|                मुनीर नियाज़ी

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