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लगता है सफ़ीने से!
तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन, लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं| जाँ निसार अख़्तर
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वो लोग ही हर दौर में!
वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं, जो इश्क़ में तालिब* नहीं मतलूब** रहे हैं| *Who Desires, **Who Is Desired जाँ निसार अख़्तर
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बँसबिट्टी में!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह गीत – बँसबिट्टी में कोयल बोलेमहुआ डाल महोखाआया कहाँ बसन्त इधर हैतुम्हें…
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तिरी नज़र का दिलों से!
ये और बात कि हर छेड़ ला-उबाली थी, तिरी नज़र का दिलों से मोआमला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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फ़ासला तो रहा!
मैं तेरी ज़ात में गुम हो सका न तू मुझ में, बहुत क़रीब थे हम फिर भी फ़ासला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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मुक़ाबला तो रहा!
चलो न इश्क़ ही जीता न अक़्ल हार सकी, तमाम वक़्त मज़े का मुक़ाबला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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क़दम क़दम पे कोई!
गुज़र ही आए किसी तरह तेरे दीवाने, क़दम क़दम पे कोई सख़्त मरहला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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हौसला तो रहा!
तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा, ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा| जाँ निसार अख़्तर
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डोले का गीत!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्यकार तथा धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भारती जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह गीत – अगर डोला कभी…
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आप दौलत के!
आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें, हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं| साहिर लुधियानवी