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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 25th Jan 2024

    आवाज़ भी दोहराते हुए

    सी लिए होंट वो पाकीज़ा निगाहें सुन कर, मैली हो जाती है आवाज़ भी दोहराते हुए|             गुलज़ार

  • 25th Jan 2024

    आवाज़ ही दे लेते!

    हसरतें अपनी बिलक्तीं न यतीमों की तरह, हम को आवाज़ ही दे लेते ज़रा जाते हुए|               गुलज़ार

  • 25th Jan 2024

    ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी!

    मैं न हूँगा तो ख़िज़ाँ कैसे कटेगी तेरी, शोख़ पत्ते ने कहा शाख़ से मुरझाते हुए|              गुलज़ार

  • 25th Jan 2024

    हम ने तो रात को!

    हम ने तो रात को दाँतों से पकड़ कर रक्खा, छीना-झपटी में उफ़ुक़ खुलता गया जाते हुए|                गुलज़ार

  • 25th Jan 2024

    कुछ भँवर डूब गए!

    तुझ को देखा है जो दरिया ने इधर आते हुए, कुछ भँवर डूब गए पानी में चकराते हुए|              गुलज़ार

  • 25th Jan 2024

    प्रबल झंझावात साथी! 

    आज एक बार फिर से मैं किसी समय हिन्दी गीत की पहचान बने स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| बच्चन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत – प्रबल झंझावात, साथी! देह पर अधिकार हारे,विवशता…

  • 24th Jan 2024

    इतना भी न घबराओ!

    इतना भी न घबराओ नई तर्ज़-ए-अदा से, हर दौर में बदले हुए उस्लूब* रहे हैं| *व्यवहार            जाँ निसार अख़्तर

  • 24th Jan 2024

    अल्फ़ाज़ में इज़हार!

    अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े, ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं|              जाँ निसार अख़्तर  

  • 24th Jan 2024

    कुछ और भी चेहरे!

    हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन, कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं|            जाँ निसार अख़्तर

  • 24th Jan 2024

    जो दर्द किसी नाम से!

    उनको न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब* से, जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं| *Name             जाँ निसार अख़्तर

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