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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Jan 2024

    रस्सी खोल दी हमने!

    कहाँ तक बोझ बैसाखी का सारी ज़िंदगी ढोते, उतरते ही कुएँ में आज रस्सी खोल दी हमने|                मुनव्वर राना

  • 16th Jan 2024

    जो मुट्ठी खोल दी हमने!

    पड़ा रहने दो अपने बोरिए पर हम फ़क़ीरों को, फटी रह जाएँगी आँखें जो मुट्ठी खोल दी हमने|                 मुनव्वर राना

  • 16th Jan 2024

    चर्ख़ी खोल दी हमने!

    चले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हमने, बढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हमने|               मुनव्वर राना

  • 16th Jan 2024

    अब तो हम को भी वो!

    हम दिया करते थे अग़्यार को ता‘ना जिनका, अब तो हम को भी वो आदाब-ए-वफ़ा याद नहीं|                क़तील शिफ़ाई

  • 16th Jan 2024

    हादिसा कब ये हुआ!

    एक वा‘दा था जो शीशे की तरह टूट गया, हादिसा कब ये हुआ कैसे हुआ याद नहीं|               क़तील शिफ़ाई

  • 16th Jan 2024

    फिर ख़यालों में वो!

    फिर ख़यालों में वो बीते हुए सावन आए, लेकिन अब तुझ को पपीहे की सदा याद नहीं|                क़तील शिफ़ाई

  • 16th Jan 2024

    झर पड़ता जीवन-डाली से!

    आज मैं छायावाद काल के एक प्रमुख स्तंभ, प्रकृति के चितेरे कवि स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| पंत जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता – झर पड़ता जीवन-डाली सेमैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात!–केवल, केवल जग-कानन…

  • 15th Jan 2024

    राह-नुमा याद नहीं!

    रास्ते याद नहीं राह-नुमा याद नहीं, अब मुझे कुछ तिरी गलियों के सिवा याद नहीं|                क़तील शिफ़ाई

  • 15th Jan 2024

    बने हैं दाएरे क्या क्या!

    ‘क़तील’ ज़ख़्म सहूँ और मुस्कुराता रहूँ, बने हैं दाएरे क्या क्या मिरे अमल के लिए|              क़तील शिफ़ाई

  • 15th Jan 2024

    हज़ार झोंपड़े गिरते हैं!

    सदा जिए ये मिरा शहर-ए-बे-मिसाल जहाँ, हज़ार झोंपड़े गिरते हैं इक महल के लिए|              क़तील शिफ़ाई

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