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कहाँ से ढूँढ के लाऊँ!
कहाँ से ढूँढ के लाऊँ चराग़ सा वो बदन, तरस गई हैं निगाहें कँवल कँवल के लिए| क़तील शिफ़ाई
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तिरा वजूद है लाज़िम!
मिरी नज़र से न हो दूर एक पल के लिए, तिरा वजूद है लाज़िम मिरी ग़ज़ल के लिए| क़तील शिफ़ाई
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तुम मन्द चलो!
आज मैं हिन्दी के प्रमुख कवि जिन्हें साहित्य से जुड़े पुरस्कारों के अलावा पद्म भूषण जैसे उच्च नागरिक सम्मान से भी अलंकृत किया गया था, ऐसे स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चतुर्वेदी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी…
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फ़स्ल-ए-गुल में बहार!
फ़स्ल-ए-गुल में बहार पहला गुलाब, किस की ज़ुल्फ़ों में टाँकती है अभी| अहमद फ़राज़
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कम सुपुर्दगी है अभी!
गरचे पहला सा इज्तिनाब* नहीं, फिर भी कम कम सुपुर्दगी है अभी| *दूर रहना अहमद फ़राज़
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क्या किया आज तक क्या पाया!
आज पहली बार मैं हिन्दी के प्रमुख व्यंग्यकार स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| परसाई जी ने शायद कुछ ही कविताएं लिखी हैं, जिनमें से एक मैं शेयर कर रहा हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिशंकर परसाई जी की यह कविता – मैं सोच रहा, सिर पर अपारदिन, मास,…