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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 13th Jan 2024

    वो भी रुक रुक के!

    मैं भी शहर-ए-वफ़ा में नौ-वारिद, वो भी रुक रुक के चल रही है अभी|             अहमद फ़राज़

  • 13th Jan 2024

    अव्वल की दोस्ती है!

    अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी, इक ग़ज़ल है कि हो रही है अभी|           अहमद फ़राज़

  • 13th Jan 2024

    गुमनाम से पहले पहले!

    कितना अच्छा था कि हम भी जिया करते थे ‘फ़राज़’, ग़ैर-मारूफ़ से गुमनाम से पहले पहले|             

  • 13th Jan 2024

    शाम से पहले पहले!

    सामने उम्र पड़ी है शब-ए-तन्हाई की, वो मुझे छोड़ गया शाम से पहले पहले|             अहमद फ़राज़

  • 13th Jan 2024

    तिरे नाम से पहले पहले

    अब तिरे ज़िक्र पे हम बात बदल देते हैं, कितनी रग़बत थी तिरे नाम से पहले पहले|               अहमद फ़राज़

  • 13th Jan 2024

    अंजाम से पहले पहले!

    ख़ुश हो ऐ दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तूने, लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले|               अहमद फ़राज़

  • 13th Jan 2024

    शाम से पहले पहले!

    साक़िया एक नज़र जाम से पहले पहले, हम को जाना है कहीं शाम से पहले पहले|              अहमद फ़राज़

  • 13th Jan 2024

    मेरी मूक पुकार!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले अपने समय के प्रमुख कवि स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएँ मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय…

  • 12th Jan 2024

    कहते रहें मर जाएँगे!

    नेमत-ए-ज़ीस्त का ये क़र्ज़ चुकेगा कैसे, लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएँगे|             फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 12th Jan 2024

    हम तिरी याद से!

    किस क़दर होगा यहाँ मेहर-ओ-वफ़ा का मातम, हम तिरी याद से जिस रोज़ उतर जाएँगे|              फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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