-
मैंने अपना दिन बिताया- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
-
तिरा ग़म तो नहीं है!
अब कारगह-ए-दहर* में लगता है बहुत दिल, ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है| Prison of The World मजरूह सुल्तानपुरी
-
शबनम तो नहीं है!
चाहे वो किसी का हो लहू दामन-ए-गुल पर, सय्याद ये कल रात की शबनम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
-
हर-चंद बहाराँ का!
कुछ ज़ख़्म ही खाएँ चलो कुछ गुल ही खिलाएँ, हर-चंद बहाराँ का ये मौसम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
-
महरम तो नहीं है!
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है, सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
-
राहज़न के साथ!
‘मजरूह’ क़ाफ़िले की मिरे दास्ताँ ये है, रहबर ने मिल के लूट लिया राहज़न के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
-
झोंके जो लग रहे हैं!
झोंके जो लग रहे हैं नसीम-ए-बहार के, जुम्बिश में है क़फ़स भी असीर-ए-चमन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी
-
फूल झर गए!
आज से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर कर यहा हूँ और इस क्रम में आज स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| कीर्ति जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी का यह नवगीत…
-
दाग़-ए-कुहन के साथ!
किस ने कहा कि टूट गया ख़ंजर-ए-फ़रंग, सीने पे ज़ख़्म-ए-नौ भी है दाग़-ए-कुहन* के साथ| *विरह का दुख मजरूह सुल्तानपुरी
-
उसी बाँकपन के साथ!
सर पर हवा-ए-ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ, अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ| मजरूह सुल्तानपुरी