आज से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर कर यहा हूँ और इस क्रम में आज स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
कीर्ति जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया कीर्ति चौधरी जी का यह नवगीत –

फूल झर गए।
क्षण-भर की ही तो देरी थी
अभी-अभी तो दृष्टि फेरी थी
इतने में सौरभ के प्राण हर गए ।
फूल झर गए ।
दिन-दो दिन जीने की बात थी,
आख़िर तो खानी ही मात थी;
फिर भी मुरझाए तो व्यथा हर गए
फूल झर गए ।
तुमको औ’ मुझको भी जाना है
सृष्टि का अटल विधान माना है
लौटे कब प्राण गेह बाहर गए ।
फूल झर गए ।
फूलों-सम आओ, हँस हम भी झरें
रंगों के बीच ही जिएँ औ’ मरें
पुष्प अरे गए, किंतु खिलकर गए ।
फूल झर गए ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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