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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Mar 2024

    रंगत बदल रही है!

    वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है, ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    है इक दरवाज़े बिन!

    है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया, मफ़र* ग़म से यहाँ कोई नहीं है| *बचाव जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    दास्ताँ सुनते हैं जैसे!

    हर इक की दास्ताँ सुनते हैं जैसे, कभी हम ने मोहब्बत की नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    मगर दिल की तो ये!

    बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत* में, मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है| *परामर्श जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    यही आदत तिरी!

    मुझे मायूस भी करती नहीं है, यही आदत तिरी अच्छी नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    मगर वो बात पहले सी!

    हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है, मगर वो बात पहले सी नहीं है| जावेद अख़्तर

  • 6th Mar 2024

    फागुन का गीत!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का यह नवगीत – गीतों से भरे दिन…

  • 5th Mar 2024

    आँगन में दीवार चुनी!

    धूप और छाँव बाँट के तुम ने आँगन में दीवार चुनी, क्या इतना आसान है ज़िंदा रहना इस आसाइश पर| गुलज़ार

  • 5th Mar 2024

    कोई एक रिहाइश पर!

    दिल का हुज्रा कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी, सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाइश पर| गुलज़ार

  • 5th Mar 2024

    काग़ज़ का इक चाँद!

    काग़ज़ का इक चाँद लगा कर रात अँधेरी खिड़की पर, दिल में कितने ख़ुश थे अपनी फ़ुर्क़त की आराइश पर| गुलज़ार

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