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रंगत बदल रही है!
वो ढल रहा है तो ये भी रंगत बदल रही है, ज़मीन सूरज की उँगलियों से फिसल रही है| जावेद अख़्तर
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है इक दरवाज़े बिन!
है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया, मफ़र* ग़म से यहाँ कोई नहीं है| *बचाव जावेद अख़्तर
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मगर दिल की तो ये!
बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत* में, मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है| *परामर्श जावेद अख़्तर
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फागुन का गीत!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदार नाथ सिंह जी का यह नवगीत – गीतों से भरे दिन…
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आँगन में दीवार चुनी!
धूप और छाँव बाँट के तुम ने आँगन में दीवार चुनी, क्या इतना आसान है ज़िंदा रहना इस आसाइश पर| गुलज़ार
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कोई एक रिहाइश पर!
दिल का हुज्रा कितनी बार उजड़ा भी और बसाया भी, सारी उम्र कहाँ ठहरा है कोई एक रिहाइश पर| गुलज़ार
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काग़ज़ का इक चाँद!
काग़ज़ का इक चाँद लगा कर रात अँधेरी खिड़की पर, दिल में कितने ख़ुश थे अपनी फ़ुर्क़त की आराइश पर| गुलज़ार