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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 9th Mar 2024

    जिस दिन मिरी जबीं!

    जिस दिन मिरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके, उस दिन ख़ुदा शिगाफ़* मिरे सर में डाल दे| *दरार कैफ़ भोपाली

  • 9th Mar 2024

    थोड़ा सा अक्स!

    थोड़ा सा अक्स चाँद के पैकर में डाल दे, तू आ के जान रात के मंज़र में डाल दे| कैफ़ भोपाली

  • 9th Mar 2024

    तेरा पता है कि नहीं है!

    यूँ ढूँडते फिरते हैं मिरे बाद मुझे वो, वो ‘कैफ़’ कहीं तेरा पता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली

  • 9th Mar 2024

    ये पूछ कि जीने में!

    मत देख कि फिरता हूँ तिरे हिज्र में ज़िंदा, ये पूछ कि जीने में मज़ा है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली

  • 9th Mar 2024

    दे दे इस साहसी अकेले को!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – दे दे रेदे दे…

  • 8th Mar 2024

    ख़ता है कि नहीं है!

    सच है कि मोहब्बत में हमें मौत ने मारा, कुछ इस में तुम्हारी भी ख़ता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली

  • 8th Mar 2024

    सुनता हूँ इक आहट!

    सुनता हूँ इक आहट सी बराबर शब-ए-वादा, जाने तिरे क़दमों की सदा है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली

  • 8th Mar 2024

    दवा है कि नहीं है!

    बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है कि नहीं है, मेरे किसी पहलू में क़ज़ा* है कि नहीं है| *इंसाफ कैफ़ भोपाली

  • 8th Mar 2024

    आँखों को हम ने!

    ये देख कर कि उन को है रंगीनियों का शौक़, आँखों को हम ने दीदा-ए-ख़ूँ-बार कर दिया| जोश मलीहाबादी

  • 8th Mar 2024

    मुझ को वो बख़्शते थे!

    मुझ को वो बख़्शते थे दो आलम की नेमतें, मेरे ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने इंकार कर दिया| जोश मलीहाबादी

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