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जिस दिन मिरी जबीं!
जिस दिन मिरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके, उस दिन ख़ुदा शिगाफ़* मिरे सर में डाल दे| *दरार कैफ़ भोपाली
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थोड़ा सा अक्स!
थोड़ा सा अक्स चाँद के पैकर में डाल दे, तू आ के जान रात के मंज़र में डाल दे| कैफ़ भोपाली
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तेरा पता है कि नहीं है!
यूँ ढूँडते फिरते हैं मिरे बाद मुझे वो, वो ‘कैफ़’ कहीं तेरा पता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली
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दे दे इस साहसी अकेले को!
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – दे दे रेदे दे…
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ख़ता है कि नहीं है!
सच है कि मोहब्बत में हमें मौत ने मारा, कुछ इस में तुम्हारी भी ख़ता है कि नहीं है| कैफ़ भोपाली
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दवा है कि नहीं है!
बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है कि नहीं है, मेरे किसी पहलू में क़ज़ा* है कि नहीं है| *इंसाफ कैफ़ भोपाली
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आँखों को हम ने!
ये देख कर कि उन को है रंगीनियों का शौक़, आँखों को हम ने दीदा-ए-ख़ूँ-बार कर दिया| जोश मलीहाबादी
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मुझ को वो बख़्शते थे!
मुझ को वो बख़्शते थे दो आलम की नेमतें, मेरे ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने इंकार कर दिया| जोश मलीहाबादी