तिरा ग़म तो नहीं है!

अब कारगह-ए-दहर* में लगता है बहुत दिल,

ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा ग़म तो नहीं है|

Prison of The World

मजरूह सुल्तानपुरी

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