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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Mar 2024

    चाँद से जब भी कहा!

    इस बुलंदी ख़ौफ़ से आज़ाद हो उस ने कहा, चाँद से जब भी कहा नीचे उतरने के लिए| शहरयार

  • 1st Mar 2024

    उषा!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के   क्रम में आज स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता – प्रात नभ…

  • 29th Feb 2024

    आसमाँ कुछ भी नहीं!

    आसमाँ कुछ भी नहीं अब तेरे करने के लिए, मैं ने सब तय्यारियाँ कर ली हैं मरने के लिए| शहरयार

  • 29th Feb 2024

    खड़ा हूँ ऐसे मक़ाम पर

    है ‘मुनीर’ हैरत-ए-मुस्तक़िल, मैं खड़ा हूँ ऐसे मक़ाम पर|   मुनीर नियाज़ी

  • 29th Feb 2024

    ग़म-ए-आम पर!

    ग़म-ए-ख़ास पर कभी चुप रहे, कभी रो दिए ग़म-ए-आम पर| मुनीर नियाज़ी

  • 29th Feb 2024

    दाना-ओ-दाम पर!

    ये नगर परिंदों का ग़ोल* है, जो गिरा है दाना-ओ-दाम पर| *झुंड मुनीर नियाज़ी

  • 29th Feb 2024

    रौशनी किसी बाम पर!

    किसी इंतिज़ार-ए-नज़र में है, कोई रौशनी किसी बाम पर| मुनीर नियाज़ी

  • 29th Feb 2024

    ये पहाड़ है मिरे सामने!

    ये पहाड़ है मिरे सामने, कि किताब मंज़र-ए-आम पर| मुनीर नियाज़ी

  • 29th Feb 2024

    वृक्षत्व!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के   क्रम में आज स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| मेहता जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी की यह कविता – माधवी के नीचे…

  • 28th Feb 2024

    साया मेरे कलाम पर!

    कोई दाग़ है मिरे नाम पर, कोई साया मेरे कलाम पर| मुनीर नियाज़ी

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