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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Feb 2024

    सफ़र की किताब जैसी

    ‘मुनीर’ तेरी ग़ज़ल अजब है, किसी सफ़र की किताब जैसी| मुनीर नियाज़ी

  • 28th Feb 2024

    लगता है दश्त जैसा!

    ये शहर लगता है दश्त जैसा, चमक है उस की सराब जैसी| मुनीर नियाज़ी

  • 28th Feb 2024

    रात गहरे अज़ाब जैसी!

    वो दिन था दोज़ख़ की आग जैसा, वो रात गहरे अज़ाब* जैसी| *Punishment मुनीर नियाज़ी

  • 28th Feb 2024

    सदा के जवाब जैसी!

    सदा है इक दूरियों में ओझल, मिरी सदा के जवाब जैसी| मुनीर नियाज़ी

  • 28th Feb 2024

    मौसम के ख़्वाब जैसी!

    हवा सहर की है इन दिनों में, बदलते मौसम के ख़्वाब जैसी| मुनीर नियाज़ी

  • 28th Feb 2024

    फागुन की शाम!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित दूसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के   क्रम में आज स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक और कविता शेयर कर रहा हूँ| भारती जी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘धर्मयुग’ के संपादक के रूप में भी विख्यात हुए थे|   भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|…

  • 27th Feb 2024

    नज़र है तेरी!

    है शक्ल तेरी गुलाब जैसी, नज़र है तेरी शराब जैसी| मुनीर नियाज़ी

  • 27th Feb 2024

    शब भर बे-आराम हुए!

    ‘इंशा’-साहिब पौ फटती है तारे डूबे सुब्ह हुई, बात तुम्हारी मान के हम तो शब भर बे-आराम हुए|     इब्न-ए-इंशा

  • 27th Feb 2024

    जी को दुखाना क्या!

    उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या, जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए| इब्न-ए-इंशा

  • 27th Feb 2024

    घटते घटते सर्द न हो!

    शौक़ की आग नफ़स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो, चाह की राह दिखा कर तुम तो वक़्फ़-ए-दरीचा-ओ-बाम हुए| इब्न-ए-इंशा

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