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हम लोग खिलौना हैं!
हम लोग खिलौना हैं इक ऐसे खिलाड़ी का, जिस को अभी सदियों तक ये खेल रचाना है| साहिर लुधियानवी
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हर खेल सुहाना है!
इक पल की पलक पर है ठहरी हुई ये दुनिया, इक पल के झपकने तक हर खेल सुहाना है| साहिर लुधियानवी
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समझा है न जाना है!
ये राह कहाँ से है ये राह कहाँ तक है, ये राज़ कोई राही समझा है न जाना है| साहिर लुधियानवी
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इतना ही फ़साना है!
संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है, इक धुँद से आना है इक धुँद में जाना है| साहिर लुधियानवी
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ख़यालों से दूर जा के!
न सोचने पर भी सोचती हूँ कि ज़िंदगानी में क्या रहेगा, तिरी तमन्ना को दफ़्न कर के तिरे ख़यालों से दूर जा के| साहिर लुधियानवी
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चुप रहेंगे नज़र झुकाके
कभी मिलेंगे जो रास्ते में तो मुँह फिरा कर पलट पड़ेंगे, कहीं सुनेंगे जो नाम तेरा तो चुप रहेंगे नज़र झुका के| साहिर लुधियानवी
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जिएँगे कैसे तुझे भुलाके
तुझे भुला देंगे अपने दिल से ये फ़ैसला तो किया है लेकिन, न दिल को मालूम है न हम को जिएँगे कैसे तुझे भुला के| साहिर लुधियानवी
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बस्तियाँ बसा के!
बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दिए जला के, मिरी वफ़ा ने उजाड़ दी हैं उमीद की बस्तियाँ बसा के| साहिर लुधियानवी
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तुम न बुझाना दीप?
आज एक बार फिर से मैं, हिन्दी के वरिष्ठ गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| राही जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – तुम न बुझाना दीप द्वार का प्राण, रात भरमेरा जगमग…
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उम्मीद को ज़िंदा!
मुद्दतों बा‘द वो आएगा हमारे घर में, फिर से ऐ दिल किसी उम्मीद को ज़िंदा कर ले| मुनव्वर राना