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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Aug 2024

    इक सुब्ह है जो!

    इक सुब्ह है जो हुई नहीं है, इक रात है जो कटी नहीं है| अली सरदार जाफ़री

  • 23rd Aug 2024

    जड़ें !

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि तथा समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल के सदस्य रहे स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता- जड़ें…

  • 22nd Aug 2024

    सर रख के मिरे सीने!

    मैं अपनी हर इक साँस उसी रात को दे दूँ, सर रख के मिरे सीने पे सो जाओ किसी दिन| अमजद इस्लाम अमजद

  • 22nd Aug 2024

    इस तरह मिरी रात!

    गुज़रें जो मेरे घर से तो रुक जाएँ सितारे, इस तरह मिरी रात को चमकाओ किसी दिन| अमजद इस्लाम अमजद

  • 22nd Aug 2024

    फूलों की तरह मुझ पे!

    ख़ुशबू की तरह गुज़रो मिरी दिल की गली से, फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन| अमजद इस्लाम अमजद

  • 22nd Aug 2024

    बादल की तरह झूम के!

    पेड़ों की तरह हुस्न की बारिश में नहा लूँ, बादल की तरह झूम के घर आओ किसी दिन| अमजद इस्लाम अमजद

  • 22nd Aug 2024

    खुल जाओ किसी दिन!

    राज़ों की तरह उतरो मिरे दिल में किसी शब, दस्तक पे मिरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन| अमजद इस्लाम अमजद

  • 22nd Aug 2024

    बरस जाओ किसी दिन!

    चेहरे पे मिरे ज़ुल्फ़ को फैलाओ किसी दिन, क्या रोज़ गरजते हो बरस जाओ किसी दिन| अमजद इस्लाम अमजद

  • 22nd Aug 2024

    आत्म अनात्म!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता- समझ में आ जानाकुछ नहीं है भीतर समझ लेने के बादएक…

  • 21st Aug 2024

    दर्द कब बे-ज़बान!

    चीख़ उठती हैं घर की दीवारें, दर्द कब बे-ज़बान होता है| अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद

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