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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Apr 2024

    मुझ को ज़माने लगे हैं!

    ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को, ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 5th Apr 2024

    वो पत्थर मिरे घर में!

    हटाए थे जो राह से दोस्तों की, वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 5th Apr 2024

    उन्हें याद आने लगे हैं!

    सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं, तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 5th Apr 2024

    अब ठिकाने लगे हैं!

    वो हैं पास और याद आने लगे हैं, मोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 5th Apr 2024

    भूलने में ज़माने लगे हैं!

    वही फिर मुझे याद आने लगे हैं, जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं| ख़ुमार बाराबंकवी

  • 5th Apr 2024

    पनघट!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार और कवि स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवींद्रनाथ त्यागी जी की यह कविता – ग्राम अलका अप्सराएँपनघट पर नीर भरे! सुन्दर सजीले अंगअचल हिले…

  • 4th Apr 2024

    ता-सहर जाएगी रात!

    रात का अंजाम भी मालूम है मुझ को ‘सुरूर’, लाख अपनी हद से गुज़रे ता-सहर जाएगी रात|     सुरूर बाराबंकवी

  • 4th Apr 2024

    तुम ठहर जाओ तो!

    हम तो जाने कब से हैं आवारा-ए-ज़ुल्मत मगर, तुम ठहर जाओ तो पल भर में गुज़र जाएगी रात| सुरूर बाराबंकवी

  • 4th Apr 2024

    आफ़्ताब आने की देर!

    है उफ़ुक़ से एक संग-ए-आफ़्ताब आने की देर, टूट कर मानिंद-ए-आईना बिखर जाएगी रात| सुरूर बाराबंकवी

  • 4th Apr 2024

    गुज़र जाएगी रात!

    अहल-ए-तूफ़ाँ बे-हिसी का गर यही आलम रहा, मौज-ए-ख़ूँ बन कर हर इक सर से गुज़र जाएगी रात| सुरूर बाराबंकवी

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