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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Oct 2024

    दोनों को तड़पाया!

    वो थी आँगन में पड़ोसी के मैं घर की छत पे था,दूरियों ने आज भी दोनों को तड़पाया बहुत| मंज़र भोपाली

  • 19th Oct 2024

    इश्क़ वालों के लिए!

    सोच लो पहले हमारे हाथ में फिर हाथ दो,इश्क़ वालों के लिए हैं आग के दरिया बहुत| मंज़र भोपाली

  • 19th Oct 2024

    तजरबा थोड़ा बहुत!

    अब समझ लेते हैं मीठे लफ़्ज़ की कड़वाहटें,हो गया है ज़िंदगी का तजरबा थोड़ा बहुत| मंज़र भोपाली

  • 19th Oct 2024

    हम ने तो सोचा बहुत!

    जान दे देंगे अगर दुनिया ने रोका रास्ता,और कोई हल न निकला हम ने तो सोचा बहुत| मंज़र भोपाली

  • 19th Oct 2024

    परियों के देश में!

    आज एक बार फिर मैं देश के वरिष्ठ कवि  श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|   सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत  –  परियों के देश में ना जाना युवराज तुमजाकर फिर लौट नही…

  • 18th Oct 2024

    क्या जवाब आएगा!

    इस को पहली बार ख़त लिक्खा तो दिल धड़का बहुत,क्या जवाब आएगा कैसे आएगा डर था बहुत| मंज़र भोपाली

  • 18th Oct 2024

    तरसते हैं बहुत से!

    ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है ‘मंज़र’,तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को| मंज़र भोपाली

  • 18th Oct 2024

    कमानों में खिंचे हैं!

    कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी,ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को| मंज़र भोपाली

  • 18th Oct 2024

    तरसती है आँख!

    बहुत से आइना-ख़ाने हैं इस बस्ती में लेकिन,तरसती है हमारी आँख चेहरा देखने को| मंज़र भोपाली

  • 18th Oct 2024

    खड़े हैं राह चलते!

    खड़े हैं राह चलते लोग कितनी ख़ामुशी से,सड़क पर मरने वालों का तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली

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