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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 20th Oct 2024

    कंगन दिलाने के लिए!

    मैं ‘ज़फ़र’ ता-ज़िंदगी बिकता रहा परदेस में,अपनी घर-वाली को इक कंगन दिलाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 20th Oct 2024

    तजरबे आए थे !

    देर तक हँसता रहा उन पर हमारा बचपना,तजरबे आए थे संजीदा बनाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 20th Oct 2024

    मैं नए घर में बहुत!

    छत टपकती थी अगरचे फिर भी आ जाती थी नींद,मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 20th Oct 2024

    आसमाँ ऐसा भी क्या!

    आसमाँ ऐसा भी क्या ख़तरा था दिल की आग से, इतनी बारिश एक शोले को बुझाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 20th Oct 2024

    आँसू वन्दनवार!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी नवगीत के अनूठे हस्ताक्षर स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|   रंजक जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत –  तुम आए, बोझिल पलकों केआँसू वन्दनवार हो गएरूप-राशि दर्पण भर…

  • 19th Oct 2024

    इक तबस्सुम जो था!

    वक़्त होंटों से मिरे वो भी खुरच कर ले गया,इक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 19th Oct 2024

    बच्चा निराले मेरे खेल!

    रेत मेरी उम्र मैं बच्चा निराले मेरे खेल,मैं ने दीवारें उठाई हैं गिराने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 19th Oct 2024

    बन गई है मसअला!

    मेरी इक छोटी सी कोशिश तुझ को पाने के लिए,बन गई है मसअला सारे ज़माने के लिए| ज़फ़र गोरखपुरी

  • 19th Oct 2024

    शहर है अंधा बहुत!

    आँख होती तो नज़र आ जाते छाले पाँव के,सच को क्या देखेगा अपना शहर है अंधा बहुत| मंज़र भोपाली

  • 19th Oct 2024

    रो लिए तन्हा बहुत!

    इस से पहले तो कभी एहसास होता ही न था,तुझ से मिल कर सोचते हैं रो लिए तन्हा बहुत| मंज़र भोपाली

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