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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Oct 2024

    मैं तो रहता हूँ !

    मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़,क़ैस करता है काम-काज मिरा| फ़हमी बदायूनी

  • 22nd Oct 2024

    हाल अच्छा नहीं है!

    चारा-गर की नज़र बताती है,हाल अच्छा नहीं है आज मिरा| फ़हमी बदायूनी

  • 22nd Oct 2024

    पूछ लेते वो बस!

    पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा,कितना आसान था इलाज मिरा| फ़हमी बदायूनी

  • 22nd Oct 2024

    मैं राख होने लगा हूँ!

    तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती,मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए| अज़हर इक़बाल

  • 22nd Oct 2024

    तिरे बदन की शिकन!

    है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन,मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए| अज़हर इक़बाल

  • 22nd Oct 2024

    पाबंदियाँ निभाते हुए!

    न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी,तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए| अज़हर इक़बाल

  • 22nd Oct 2024

    लोग हँसते गाते हुए!

    ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर लहू लहू चेहरे,कहाँ चले गए वो लोग हँसते गाते हुए| अज़हर इक़बाल

  • 22nd Oct 2024

    अंग-अंग चन्दनवन!

    आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और संपादक स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का एक नावगीत शेयर कर रहा हूँ|   नंदन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह नवगीत –  एक नाम अधरों पर आयाअंग-अंग चन्दनवन हो गया। बोल…

  • 21st Oct 2024

    मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ!

    घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए,मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए| अज़हर इक़बाल

  • 21st Oct 2024

    मंज़िल का पता!

    हाँ मगर तस्दीक़ में उम्रें गुज़र जाती हैं ‘नूर’,कुछ न कुछ रहता है सब को अपनी मंज़िल का पता| कृष्ण बिहारी नूर

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