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मैं राख होने लगा हूँ!
तुम्हारे आने की उम्मीद बर नहीं आती,मैं राख होने लगा हूँ दिए जलाते हुए| अज़हर इक़बाल
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तिरे बदन की शिकन!
है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन,मैं ख़ुद ही मिटने लगा हूँ उसे मिटाते हुए| अज़हर इक़बाल
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पाबंदियाँ निभाते हुए!
न जाने ख़त्म हुई कब हमारी आज़ादी,तअल्लुक़ात की पाबंदियाँ निभाते हुए| अज़हर इक़बाल
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लोग हँसते गाते हुए!
ये ज़ख़्म ज़ख़्म मनाज़िर लहू लहू चेहरे,कहाँ चले गए वो लोग हँसते गाते हुए| अज़हर इक़बाल
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अंग-अंग चन्दनवन!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और संपादक स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का एक नावगीत शेयर कर रहा हूँ| नंदन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी का यह नवगीत – एक नाम अधरों पर आयाअंग-अंग चन्दनवन हो गया। बोल…
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मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ!
घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए,मैं ख़ुद से रूठ गया हूँ उसे मनाते हुए| अज़हर इक़बाल
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मंज़िल का पता!
हाँ मगर तस्दीक़ में उम्रें गुज़र जाती हैं ‘नूर’,कुछ न कुछ रहता है सब को अपनी मंज़िल का पता| कृष्ण बिहारी नूर