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ये तारे रौशनी अपनी!
नहीं घटती मिरी आँखों में तारीकी शब-ए-ग़म की,ये तारे रौशनी अपनी अबस बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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छूटा-गाँव, छूटी गली!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक गरीब और अशिक्षित कन्या के मन में पैदा होने वाली आशंकाएं अभिव्यक्त की गई हैं, जिसे विवाह होने पर अनजान क्षेत्र में जाना पड़ता है| चक्रधर जी…
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जन्नत इसी दुनिया में!
मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है, नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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तुझे आबाद करते हैं!
ज़रा ऐ कुंज-ए-मरक़द याद रखना उस हमिय्यत को,कि घर वीरान कर के हम तुझे आबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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क़ैद से आज़ाद करते!
नया मस्लक नया रंग-ए-सुख़न ईजाद करते हैं,उरूस-ए-शेर को हम क़ैद से आज़ाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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वतन की आबरू !
नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं,वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं| चकबस्त ब्रिज नारायण
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नए साल का गीत!
आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – अगर न दर्द मिटा मन से गत का, आगत का हर्ष…