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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Oct 2024

    तमाशा देखने को!

    गए थे शौक़ से हम भी ये दुनिया देखने को,मिला हम को हमारा ही तमाशा देखने को| मंज़र भोपाली

  • 18th Oct 2024

    चीख़ों से पुकारों से!

    कभी पत्थर के दिल ऐ ‘कैफ़’ पिघले हैं न पिघलेंगे,मुनाजातों से फ़रियादों से चीख़ों से पुकारों से| कैफ़ भोपाली

  • 18th Oct 2024

    नववर्ष – चार कविताएं

    आज एक बार फिर मैं देश के वरिष्ठ और श्रेष्ठ साहित्यकार श्री रामदरश मिश्र जी की नववर्ष पर लिखी गई चार कविताएं शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविताएं – कल नव वर्ष आने वाला हैआज…

  • 17th Oct 2024

    रूह की आवाज़!

    बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है,कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    गुफाओं से पहाड़ों से!

    सुने कोई तो अब भी रौशनी आवाज़ देती है,गुफाओं से पहाड़ों से बयाबानों से ग़ारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    उमीदों से भरोसों से !

    ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं,उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    हमारे ज़ख़्म-ए-दिल!

    हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं,गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    फूलों से सितारों से!

    हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से,शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    आँख चुरा कर जा न!

    दिल को चुराया ख़ैर चुराया,आँख चुरा कर जा न लुटेरे| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    पाँव न पड़वा तेरे मेरे!

    हम तो हैं तेरे पूजने वाले,पाँव न पड़वा तेरे मेरे| कैफ़ भोपाली

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