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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 15th Oct 2024

    उनको बारात लिखूँ!

    ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ| जावेद अख़्तर

  • 15th Oct 2024

    कसीली बात लिखूँ!

    किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ,शे’र की मैं तहज़ीब बना हूँ या अपने हालात लिखूँ| जावेद अख़्तर

  • 15th Oct 2024

    मगर न छोड़ेंगे लोग!

    वो साँप छोड़ दे डसना ये मैं भी कहता हूँ,मगर न छोड़ेंगे लोग उस को गर न फुन्कारा| जावेद अख़्तर

  • 15th Oct 2024

    खुले थे पर तो मिरा!

    जो पर समेटे तो इक शाख़ भी नहीं पाई,खुले थे पर तो मिरा आसमान था सारा| जावेद अख़्तर

  • 15th Oct 2024

    रक्खा हुआ ये अँगारा!

    किसी की आँख से टपका था इक अमानत है,मिरी हथेली पे रक्खा हुआ ये अँगारा| जावेद अख़्तर

  • 15th Oct 2024

    निथर गई है फ़ज़ा!

    बरस के खुल गए आँसू निथर गई है फ़ज़ा,चमक रहा है सर-ए-शाम दर्द का तारा| जावेद अख़्तर

  • 15th Oct 2024

    ख़लिश से छुटकारा!

    मैं पा सका न कभी इस ख़लिश से छुटकारा,वो मुझ से जीत भी सकता था जाने क्यूँ हारा जावेद अख़्तर

  • 15th Oct 2024

    मित्रता और पवित्रता!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी में अपने किस्म के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|   भवानी दादा की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता  –  आडम्बर मेंसमाप्त न होने पाएपवित्रता और समाप्त न…

  • 14th Oct 2024

    मेरे तरफ़-दार से हैं!

    जब से वो अहल-ए-सियासत में हुए हैं शामिल,कुछ अदू के हैं तो कुछ मेरे तरफ़-दार से हैं| गुलज़ार

  • 14th Oct 2024

    हम उसी बाज़ार से हैं!

    रूह से छीले हुए जिस्म जहाँ बिकते हैं,हम को भी बेच दे हम भी उसी बाज़ार से हैं| गुलज़ार

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