गुज़र जाएगी रात!

अहल-ए-तूफ़ाँ बे-हिसी का गर यही आलम रहा,

मौज-ए-ख़ूँ बन कर हर इक सर से गुज़र जाएगी रात|

सुरूर बाराबंकवी

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