-
हर्फ़ शनासाई का!
दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ, आज अर्ज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
शब-ए-तन्हाई का!
चाँद निकले किसी जानिब तिरी ज़ेबाई* का, रंग बदले किसी सूरत शब-ए-तन्हाई का| *Beauty फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
लिख रखी हों मसर्रतें!
मिरी जान आज का ग़म न कर कि न जाने कातिब-ए-वक़्त ने, किसी अपने कल में भी भूल कर कहीं लिख रखी हों मसर्रतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
सनम की मुरव्वतें!
जो तुम्हारी मान लें नासेहा* तो रहेगा दामन-ए-दिल में क्या, न किसी अदू की अदावतें न किसी सनम की मुरव्वतें| *Priest, Guide फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
बुलावा!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के प्रसिद्ध गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| अवस्थी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत – प्यार से मुझको बुलाओगे जहाँएक क्या सौ बार आऊँगा वहाँ पूछने…
-
शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें
ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के, कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
दूरियाँ कभी क़ुर्बतें!
सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें, कभी सोहबतें कभी फ़ुर्क़तें कभी दूरियाँ कभी क़ुर्बतें| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
-
‘कैफ़’ ही के साथ!
लिखता है ग़म की बात मसर्रत के मूड में, मख़्सूस है ये तर्ज़ फ़क़त ‘कैफ़’ ही के साथ| कैफ़ भोपाली
-
मिरी आवारगी के साथ!
शाइस्तगान-ए-शहर मुझे ख़्वाह कुछ कहें, सड़कों का हुस्न है मिरी आवारगी के साथ| कैफ़ भोपाली