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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Nov 2025

    रात किनारा, दरिया!

    रात किनारा दरिया दिनरात के पीछे बहता दिन नज़ीर क़ैसर

  • 29th Nov 2025

    रौशनी अंधेरे का विलोम नहीं होती!

    आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि कुमारेंद्र पारस नाथ सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।लीजिए आज प्रस्तुत है कुमारेंद्र पारस नाथ सिंह जी की यह कविता- यहाँ से वहाँ तक दौड़ती रहती है।कभी-कभीजब बहुत घना हो जाता है अंधेरा,लगता है,/ नहीं है–…

  • 28th Nov 2025

    भीग रहा था मुझ में!

    बरस रही थी बारिश बाहर,और वो भीग रहा था मुझ में| नज़ीर क़ैसर

  • 28th Nov 2025

    भूल गया है रस्ता!

    कोई मुझ को ढूँढने वाला,भूल गया है रस्ता मुझ में| नज़ीर क़ैसर

  • 28th Nov 2025

    मंज़र जागा मुझ में!

    बंद हुई जाती हैं आँखें,कैसा मंज़र जागा मुझ में| नज़ीर क़ैसर

  • 28th Nov 2025

    अपना साया मुझ में!

    दिया जला के छोड़ गया है,कोई अपना साया मुझ में| नज़ीर क़ैसर

  • 28th Nov 2025

    वो सुबह कभी तो आएगी!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं आज अपने स्वर में फिल्म- फिर सुबह होगी, के लिए मुकेश जी का गाया यह बहुत सुंदर गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- वो सुबह कभी तो आएगी आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद।

  • 28th Nov 2025

    कोई पुराना शहर है!

    कोई पुराना शहर है जिस का,खुलता है दरवाज़ा मुझ में| नज़ीर क़ैसर

  • 28th Nov 2025

    सपनों का व्यापार!

    प्रस्तुत है आज का एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- झंझट सदा रहेंगे यारग़ज़लें तो लिख लें दो-चार। सुख-दुख सारे सहकर हमकरते सपनों का व्यापार। पुरस्कार तुम ले लेनाबात हमें कहने दो यार। दिल के हम सरमायादारपर लोगों का बहुत उधार। बसे दूर कितने आकरक्या देखें दिल्ली दरबार। अरमानों से रहती हैठोस हक़ीकत की…

  • 27th Nov 2025

    तारा टूटा मुझ में!

    कैसा तारा टूटा मुझ में,झाँक रही है दुनिया मुझ में| नज़ीर क़ैसर

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