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मिट्टी में सोना है अभी!
हम ने खिलते देखना है फिर ख़याबान-ए-बहार, शहर के अतराफ़* की मिट्टी में सोना है अभी| *आसपास मुनीर नियाज़ी
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दिल से धोना है अभी!
जो हुआ होना ही था सो हो गया है दोस्तो, दाग़ इस अहद-ए-सितम का दिल से धोना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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यादों में खोना है अभी!
ऐसी यादों में घिरे हैं जिन से कुछ हासिल नहीं, और कितना वक़्त उन यादों में खोना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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इक खिलौना है अभी!
क्यूँ दिया दिल उस बुत-ए-कमसिन को ऐसे वक़्त में, दिल सी शय जिस के लिए बस इक खिलौना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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ख़्वाब बोना है अभी!
रात इतनी जा चुकी है और सोना है अभी, इस नगर में इक ख़ुशी का ख़्वाब बोना है अभी| मुनीर नियाज़ी
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अन-कहे सवाल की!
देख के मुझ को ग़ौर से फिर वो चुप से हो गए, दिल में ख़लिश है आज तक इस अन-कहे सवाल की| मुनीर नियाज़ी
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खोने को पाने आये हो!
आज एक बार फिर मैं अत्यंत वरिष्ठ राष्ट्रीय कवि स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माखनलाल चतुर्वेदी जी की यह कविता – खोने को पाने आये हो?रूठा यौवन पथिक, दूर तकउसे मनाने आये हो?खोने को पाने…
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उम्र के साथ अजीब!
उम्र के साथ अजीब सा बन जाता है आदमी, हालत देख के दुख हुआ आज उस परी-जमाल की| मुनीर नियाज़ी
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शाम झुकी थी बहर पर
शाम झुकी थी बहर पर पागल हो कर रंग से, या तस्वीर थी ख़्वाब में मेरे किसी ख़याल की| मुनीर नियाज़ी
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दहशत थी भौंचाल की
शहर में डर था मौत का चाँद की चौथी रात को, ईंटों की इस खोह में दहशत थी भौंचाल की| मुनीर नियाज़ी