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वो आइना है तो मैं!
मुझे पता तो चले मुझ में ऐब हैं क्या क्या,वो आइना है तो मैं उस के रू-ब-रू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं उस की आँखों में!
बड़ा हसीन तक़द्दुस है उस के चेहरे पर,मैं उस की आँखों में झाँकूँ तो बा-वज़ू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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किसी ग़रीब की!
किसी ग़रीब की बरसों की आरज़ू हो जाऊँ,मैं इस सुरंग से निकलूँ तो आब-जू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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ख़ौफ़ में डूबे हुए!
ख़ौफ़ में डूबे हुए शहर की क़िस्मत है यही,मुंतज़िर रहता है हर शख़्स कि क्या होता है| मुनव्वर राना
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मुस्तक़िल ज़ख़्म का!
मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन,मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है| मुनव्वर राना
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कोई मंज़र हो मिरा!
सारी दुनिया का सफ़र ख़्वाब में कर डाला है,कोई मंज़र हो मिरा देखा हुआ होता है| मुनव्वर राना
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ख़ाक आँखों से लगाई!
ख़ाक आँखों से लगाई तो ये एहसास हुआ,अपनी मिट्टी से हर इक शख़्स जुड़ा होता है| मुनव्वर राना
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रेत पर ओस से!
वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है,रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है| मुनव्वर राना
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जीवन में कितना सूनापन!
आज एक बार मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – जीवन में कितना सूनापनपथ निर्जन है, एकाकी है,उर में मिटने का आयोजनसामने…
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यारों के इल्तिफ़ात का!
लगता है उस की बातों से ये ‘शहरयार’ भी,यारों के इल्तिफ़ात का मारा हुआ सा है| शहरयार