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दुनिया के कारोबार से!
पहले थे जो भी आज मगर कारोबार-ए-इश्क़,दुनिया के कारोबार से मिलता हुआ सा है| शहरयार
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ले दे के एक दिल है!
नज़राना तेरे हुस्न को क्या दें कि अपने पास,ले दे के एक दिल है सो टूटा हुआ सा है| शहरयार
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चेहरा हर एक शख़्स का!
क्या हादिसा हुआ है जहाँ में कि आज फिर,चेहरा हर एक शख़्स का उतरा हुआ सा है| शहरयार
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क्यूँ वक़्त एक मोड़ पे!
चल चल के थक गया है कि मंज़िल नहीं कोई,क्यूँ वक़्त एक मोड़ पे ठहरा हुआ सा है| शहरयार
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गुलशन में इस तरह से!
गुलशन में इस तरह से कब आई थी फ़स्ल-ए-गुल,हर फूल अपनी शाख़ से टूटा हुआ सा है| शहरयार
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पीले फूल कनेर के!
आज मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मेहता जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी का यह नवगीत – पीले फूल कनेर केपट अंगोरते सिन्दूरी बड़री अँखियन केफूले फूल दुपेर के। दौड़ी हिरनाबन-बन अंगनावोंत वनों…