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ख़ामुशी अच्छी नहीं!
ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए, ये तमाशा अब सर-ए-बाज़ार होना चाहिए| ज़फ़र इक़बाल
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नानी!
आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि श्री प्रयाग शुक्ल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शुक्ल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री प्रयाग शुक्ल जी की यह कविता – मेरी बेटी ने नहीं देखा मेरी नानी को ।(नानी की कोई तस्वीर भी नहीं है मेरे…
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मंज़िल ने दिए ताने!
मंज़िल ने दिए ताने रस्ते भी हँसे लेकिन, चलते रहे अक्सर हम कुछ और तरह से भी| हस्तीमल हस्ती
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जलता है किसी का ग़म!
शो’ला भी नहीं उठता काजल भी नहीं बनता,जलता है किसी का ग़म कुछ और तरह से भी| हस्तीमल हस्ती
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आँखें हैं हमारी नम !
इस बार मिले हैं ग़म कुछ और तरह से भी,आँखें हैं हमारी नम कुछ और तरह से भी| हस्तीमल हस्ती
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मैं लखनऊ हो जाऊँ!
नए मिज़ाज के शहरों में जी नहीं लगता,पुराने वक़्तों का फिर से मैं लखनऊ हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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अगर मैं ज़ख़्म की!
कमी ज़रा सी भी मुझ में न कोई रह जाए,अगर मैं ज़ख़्म की सूरत हूँ तो रफ़ू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ!
मिरी हथेली पे होंटों से ऐसी मोहर लगा,कि उम्र-भर के लिए मैं भी सुर्ख़-रू हो जाऊँ| मुनव्वर राना
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कभी जब याद आ जाते!
आज मैं हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ आलोचक तथा हिन्दी कवि स्वर्गीय नामवर सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नामवर जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत – कभी जब याद आ जाते नयन को घेर लेते घन,स्वयं…