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ग़लत-फ़हमी में मत रहना!
उसे तुम से मोहब्बत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना,ये बस दिल की शरारत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना| आदिल राही
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तिरे सिवा भी किसी को!
ये क्या सितम है कि इस नश्शा-ए-मोहब्बत में,तिरे सिवा भी किसी को पुकार आए हम| अज़हर इक़बाल
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फिर उस गली से बहुत!
फिर उस गली से गुज़रना पड़ा तिरी ख़ातिर,फिर उस गली से बहुत बे-क़रार आए हम| अज़हर इक़बाल
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जागो मन के सजग पथिक ओ!
आज मैं प्रसिद्ध आंचलिक कथा और उपन्यास लेखक तथा श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रेणु जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता – मेरे मन के आसमान में…
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उम्रें गुज़ार आए हम!
तिरे ही लम्स से उन का ख़िराज मुमकिन है,तिरे बग़ैर जो उम्रें गुज़ार आए हम| अज़हर इक़बाल
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और उस में डूब के!
वो एक झील थी शफ़्फ़ाफ़ नील पानी की,और उस में डूब के ख़ुद को निखार आए हम| अज़हर इक़बाल
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गुलाब चाँदनी-रातों पे!
गुलाब चाँदनी-रातों पे वार आए हम, तुम्हारे होंटों का सदक़ा उतार आए हम| अज़हर इक़बाल
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तुम्हें गले से!
ये ख़ौफ़ है कि रगों में लहू न जम जाए,तुम्हें गले से लगाया नहीं बहुत दिन से| अज़हर इक़बाल
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हर एक शख़्स यहाँ !
हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है,किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से| अज़हर इक़बाल
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कि हम ने ख़ुद को भी!
ये कैफ़ियत है मेरी जान अब तुझे खो कर,कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से| अज़हर इक़बाल