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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Dec 2024

    ग़लत-फ़हमी में मत रहना!

    उसे तुम से मोहब्बत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना,ये बस दिल की शरारत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना| आदिल राही

  • 3rd Dec 2024

    तिरे सिवा भी किसी को!

    ये क्या सितम है कि इस नश्शा-ए-मोहब्बत में,तिरे सिवा भी किसी को पुकार आए हम| अज़हर इक़बाल

  • 3rd Dec 2024

    फिर उस गली से बहुत!

    फिर उस गली से गुज़रना पड़ा तिरी ख़ातिर,फिर उस गली से बहुत बे-क़रार आए हम| अज़हर इक़बाल

  • 3rd Dec 2024

    जागो मन के सजग पथिक ओ!

    आज मैं प्रसिद्ध आंचलिक कथा और उपन्यास लेखक तथा श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|   रेणु जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की यह कविता –  मेरे मन के आसमान में…

  • 2nd Dec 2024

    उम्रें गुज़ार आए हम!

    तिरे ही लम्स से उन का ख़िराज मुमकिन है,तिरे बग़ैर जो उम्रें गुज़ार आए हम| अज़हर इक़बाल

  • 2nd Dec 2024

    और उस में डूब के!

    वो एक झील थी शफ़्फ़ाफ़ नील पानी की,और उस में डूब के ख़ुद को निखार आए हम| अज़हर इक़बाल

  • 2nd Dec 2024

    गुलाब चाँदनी-रातों पे!

    गुलाब चाँदनी-रातों पे वार आए हम, तुम्हारे होंटों का सदक़ा उतार आए हम| अज़हर इक़बाल

  • 2nd Dec 2024

    तुम्हें गले से!

    ये ख़ौफ़ है कि रगों में लहू न जम जाए,तुम्हें गले से लगाया नहीं बहुत दिन से| अज़हर इक़बाल

  • 2nd Dec 2024

    हर एक शख़्स यहाँ !

    हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है,किसी ने हम को जगाया नहीं बहुत दिन से| अज़हर इक़बाल

  • 2nd Dec 2024

    कि हम ने ख़ुद को भी!

    ये कैफ़ियत है मेरी जान अब तुझे खो कर,कि हम ने ख़ुद को भी पाया नहीं बहुत दिन से| अज़हर इक़बाल

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