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मेरे अहद के इंसानों!
मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं,ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत| क़ैसर शमीम
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छुपे हुए उलझाव!
अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ,सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम
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सोच का है ये फेर!
सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में,ढूँड रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम
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आज दबाव बहुत!
बहके बहके से बादल हैं क्या जाने ये जाएँ किधर,बदली हुई हवाओं का है उन पर आज दबाव बहुत| क़ैसर शमीम
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आपस के टकराव!
होने लगे हैं रस्ते रस्ते, आपस के टकराव बहुत,एक साथ के चलने वालों में भी है अलगाव बहुत| क़ैसर शमीम
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गीतों की भाषा!
आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – तुम्हीं न समझी जब मेरे गीतों की भाषादुनिया सौ-सौ अर्थ लगाये क्या होता है यह…
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मोहब्बत की रिवायत!
झुकी नज़रों से तकना और ख़मोशी से गुज़र जाना,मोहब्बत की रिवायत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना| आदिल राही
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मैं तुझ को चाहता हूँ!
मैं तुझ को चाहता हूँ बात ये सच है मगर फिर भी, मुझे तेरी ज़रूरत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना| आदिल राही
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कहा भी था सियासत है!
हुए बर्बाद तो अब आह-ओ-ज़ारी कर रहे हो तुम,कहा भी था सियासत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना| आदिल राही
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उसे हँसने की आदत है!
तुम्ही को देख कर वो मुस्कुराता है तो हैरत क्या,उसे हँसने की आदत है ग़लत-फ़हमी में मत रहना| आदिल राही