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ससुर जी उवाच!
आज मैं हिंदी के अत्यंत श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। चक्रधर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – डरते झिझकतेसहमते सकुचातेहम अपने होने वालेससुर जी के पास आए,बहुत कुछ कहना…
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उम्र भर सच ही कहा!
उम्र भर सच ही कहा सच के सिवा कुछ न कहा,अज्र क्या इस का मिलेगा ये न सोचा हम ने| शहरयार
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एक मुद्दत से कोई!
कौन सा क़हर ये आँखों पे हुआ है नाज़िल,एक मुद्दत से कोई ख़्वाब न देखा हम ने| शहरयार
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ख़ुद पशीमान हुए!
ख़ुद पशीमान हुए न उसे शर्मिंदा किया,इश्क़ की वज़्अ को क्या ख़ूब निभाया हम ने| शहरयार
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कभी कभी मेरे दिल में
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में मुकेश जी और लता जी का गाया फिल्म कभी कभी का यह गाना प्रस्तुत कर रहा हूँ- कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है! आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। *****
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सन्नाटा शहर में!
आज फिर से मेरी एक पुरानी कविता प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- बेहद ठंडा है शहरी मरुथललो अब हम इसको गरमाएंगे,तोड़ेंगे जमा हुआ सन्नाटाभौंकेंगे, रैंकेंगे, गाएंगे। दड़बे में कुछ सुधार होना है,हमको ही सूत्रधार होना है,ये जो हम बुनकर फैलाते हैं,अपनी सरकार का बिछौना है।चिंतन सन्नाटा गहराता है,शब्द वमन से उसको ढाएंगे।तोड़ेंगे जमा…
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देख ली दुनिया हमने!
जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने,इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने| शहरयार