-
आज हैं केसर रंग रंगे वन!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गिरिजाकुमार माथुर जी का यह गीत- आज हैं केसर रंग रंगे वनरंजित शाम भी फागुन की खिली खिली पीली कली-सीकेसर के वसनों…
-
कश्तियाँ देना मगर!
कश्तियाँ देना मगर इज़्न-ए-सफ़र से पहले,ठहरे पानी को भी दरिया की रवानी देना| क़ैसर शमीम
-
मिरी आँखों को अगर !
पोंछ लेना मिरी पलकों से लहू की बूँदें,मिरी आँखों को अगर मंज़र-ए-सानी देना| क़ैसर शमीम
-
तिरी आवाज़ से जब!
तिरी आवाज़ से जब टूटे मिरे घर का सुकूत,दर-ओ-दीवार को भी सेहर-बयानी देना| क़ैसर शमीम
-
पत्तों की तरह बे-दर्द!
छूटे न कभी फूलों का नगर कोशिश तो यही है अपनी मगर,इक रोज़ उड़ा ले जाएगी पत्तों की तरह बे-दर्द हवा| क़ैसर शमीम
-
भाषा वंदना!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में श्री सोम ठाकुर जी का प्रसिद्ध गीत ‘भाषा वंदना’ प्रस्तुत कर रहा हूँ- ‘करते हैं तन-मन से वंदन जन, गण, मन की अभिलाषा का अभिनंदन अपनी संस्कृति का, आराधन अपनी भाषा का’ आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद ।
-
कहाँ की गर्द हवा!
सब अपने शनासा छोड़ गए रस्ते में हमें ग़ैरों की तरह,चेहरे पे हमारे डाल गई ला कर ये कहाँ की गर्द हवा| क़ैसर शमीम
-
जितना नूतन प्यार तुम्हारा!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवियित्री सुश्री स्नेहलता स्नेह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री स्नेहलता स्नेह जी का यह गीत- जितना नूतन प्यार तुम्हाराउतनी मेरी व्यथा पुरानीएक साथ कैसे निभ पायेसूना द्वार और अगवानी। तुमने जितनी संज्ञाओं सेमेरा नामकरण कर…