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मोहब्बत बहुत बे-मज़ा!
मोहब्बत बहुत बे-मज़ा होगी जिस दिन, ज़बाँ बे-नियाज़-ए-शिकायात होगी| नज़ीर बनारसी
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तिरे ज़ुल्फ़ ओ आरिज़!
समझती है शाम ओ सहर जिस को दुनिया, तिरे ज़ुल्फ़ ओ आरिज़ की ख़ैरात होगी| नज़ीर बनारसी
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श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ की रचनायें-14
मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज चौदहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा । इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ। जैसा मैंने…
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पुराने शहर के लोगों में!
पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है, हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा| मुनव्वर राना
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ये बेमौसम का फल है!
हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है, ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा| मुनव्वर राना