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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 21st Jan 2025

    कहीं हवा ही न हो!

    सफ़र में है जो अज़ल से ये वो बला ही न हो,किवाड़ खोल के देखो कहीं हवा ही न हो| मुनीर नियाज़ी

  • 21st Jan 2025

    ये ज़माना भी !

    न रहे जब वो भले दिन भी ‘क़तील’,ये ज़माना भी गुज़र जाएगा| क़तील शिफ़ाई

  • 21st Jan 2025

    मुझ को खो कर वो!

    काएनात उस की मिरी ज़ात में है,मुझ को खो कर वो किसे पाएगा| क़तील शिफ़ाई

  • 21st Jan 2025

    दिल्ली में!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।                         लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – कारों की रेस मेंशामिल बैलगाड़ियाँख़ुश है घोड़ागाड़ियों को देख करसभ्यता का विकास बरकरार है यहाँसर…

  • 20th Jan 2025

    उसे याद बहुत आएँगे!

    हम उसे याद बहुत आएँगे,जब उसे भी कोई ठुकराएगा| क़तील शिफ़ाई

  • 20th Jan 2025

    कौन आ कर हमें!

    तू न होगी तो फिर ऐ शाम-ए-फ़िराक़,कौन आ कर हमें बहलाएगा| क़तील शिफ़ाई

  • 20th Jan 2025

    झूटी भी क़सम!

    ए’तिबार उस का हमेशा करना,वो तो झूटी भी क़सम खाएगा| क़तील शिफ़ाई

  • 20th Jan 2025

    सच से कतराए अगर!

    सच से कतराए अगर लोग यहाँ,लफ़्ज़ मफ़्हूम* से कतराएगा|*Meaning क़तील शिफ़ाई

  • 20th Jan 2025

    बात क्या फिर कोई!

    चल पड़ी रस्म जो कज-फ़हमी* की,बात क्या फिर कोई कर पाएगा| *Misunderstanding क़तील शिफ़ाई

  • 20th Jan 2025

    साए को तरस जाएगा!

    मरहला रात का जब आएगा,जिस्म साए को तरस जाएगा| क़तील शिफ़ाई

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