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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Jan 2025

    तिरा ख़याल कि!

    मिरी मिसाल कि इक नख़्ल-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ,तिरा ख़याल कि शाख़-ए-चमन का ताइर तू| अहमद फ़राज़

  • 17th Jan 2025

    हुई है शाम तो !

    हुई है शाम तो आँखों में बस गया फिर तू,कहाँ गया है मिरे शहर के मुसाफ़िर तू| अहमद फ़राज़

  • 17th Jan 2025

    एक झोंका था कि !

    मैं कि सहरा-ए-मोहब्बत का मुसाफ़िर था ‘फ़राज़’,एक झोंका था कि ख़ुश्बू के सफ़र पर निकला| अहमद फ़राज़

  • 17th Jan 2025

    तिरा लश्कर निकला!

    तू यहीं हार गया है मिरे बुज़दिल दुश्मन,मुझ से तन्हा के मुक़ाबिल तिरा लश्कर निकला| अहमद फ़राज़

  • 17th Jan 2025

    वही ख़ंजर निकला!

    शहर-वालों की मोहब्बत का मैं क़ाएल हूँ मगर,मैं ने जिस हाथ को चूमा वही ख़ंजर निकला| अहमद फ़राज़

  • 17th Jan 2025

    सूनी सांझ!

    आज मैं विख्यात हिंदी कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की  एक कविता शेयर कर रहा हूँ। सुमन जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयरकी हैं।                  लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – बहुत दिनों में आज मिली हैसाँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम। पेड खडे फैलाए…

  • 16th Jan 2025

    जब कोई फूल मिरी!

    मैं ने उस जान-ए-बहाराँ को बहुत याद किया,जब कोई फूल मिरी शाख़-ए-हुनर पर निकला| अहमद फ़राज़

  • 16th Jan 2025

    दरिया भी मुझी में डूबे!

    था जिन्हें ज़ो’म वो दरिया भी मुझी में डूबेमैं कि सहरा नज़र आता था समुंदर निकला अहमद फ़राज़

  • 16th Jan 2025

    मैं तो मक़्तल में भी!

    मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकलाक़ुरआ-ए-फ़ाल मिरे नाम का अक्सर निकला अहमद फ़राज़

  • 16th Jan 2025

    कुछ अपने दिल की!

    कुछ अपने दिल की ख़ू* का भी शुक्राना चाहिए,सौ बार उन की ख़ू का गिला कर चुके हैं हम|*Nature फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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