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एक प्यार सब कुछ!
आज मैं हिंदी नवगीत की श्रेष्ठ कवियित्री स्वर्गीय शांति सुमन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयरकी हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शांति सुमन जी का यह गीत – मुझमें अपनापन बोता हैसांझ-सकारे यह मेरा घर उगते ही सूरज के-रोशनदान बांटते ढेर उजालेधूपों के परदे…
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मस्ती भरी नज़र से!
होश-ओ-हवास पे मिरे बिजली सी गिर पड़ी, मस्ती भरी नज़र से पिला के चले गए| मजरूह सुल्तानपुरी
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वीरान मिरा दिल था!
इस दिल से आ रही है किसी यार की सदा,वीरान मिरा दिल था बसाते चले गए| मजरूह सुल्तानपुरी
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जो हर ख़ुशी में तिरे!
मसर्रतों को ये अहल-ए-हवस न खो देते,जो हर ख़ुशी में तिरे ग़म को भी समो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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तमन्ना के दाग़ धो देते!
कभी तो यूँ भी उमँडते सरिश्क-ए-ग़म ‘मजरूह’,कि मेरे ज़ख़्म-ए-तमन्ना के दाग़ धो देते| मजरूह सुल्तानपुरी