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अख़बार के दफ़्तर!
वाक़िआ शहर में कल तो कोई ऐसा न हुआ,ये तो अख़बार के दफ़्तर की ख़बर लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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ये सदी दुश्मन-ए!
कोई आसूदा नहीं अहल-ए-सियासत के सिवा,ये सदी दुश्मन-ए-अरबाब-ए-हुनर लगती है| जाँ निसार अख़्त
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ख़ून से तर लगती है!
सारी दुनिया में ग़रीबों का लहू बहता है,हर ज़मीं मुझ को मिरे ख़ून से तर लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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आग किधर लगती है!
जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं,देखना ये है कि अब आग किधर लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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ख़ुशबू का सफ़र!
लम्हे लम्हे में बसी है तिरी यादों की महक,आज की रात तो ख़ुशबू का सफ़र लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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नदी!
आज एक बार फिर मैं नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – एक मीनार उठती रही एक मीनार ढहती रही अनरुकी अनथकी सामने यह नदी किन्तु…
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अब हमें तेरी गली!
हम ने हर गाम पे सज्दों के जलाए हैं चराग़,अब हमें तेरी गली राहगुज़र लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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सर से पा तक वो!
मौज-ए-गुल मौज-ए-सबा मौज-ए-सहर लगती है,सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है| जाँ निसार अख़्तर
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उस दिन खुला ये राज़!
बाज़ू छुआ जो तू ने तो उस दिन खुला ये राज़,तू सिर्फ़ रंग-ओ-बू ही नहीं है बदन भी है| जाँ निसार अख़्तर
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तू जान-ए-अंजुमन!
मुतरिब भी तू नदीम भी तू साक़िया भी तू,तू जान-ए-अंजुमन ही नहीं अंजुमन भी है| जाँ निसार अख़्तर